ऐसे निबटेंगे आतंक से ?

देश की राजधानी के नथूनों में आज फिर बारूद की गंध घुस गई। तमाम जिंदगियां मौत की भेंट चढ़ गईं और तमाम अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं। आतंक का कहर न तो इस देश के लिए नया है और न इसके दिल-दिल्ली के लिए। इसलिए यकीन मानिए दिल्ली फिर उठ खड़ी होगी पूरी ताकत के साथ क्योंकि इस देश के आम आदमी के भीतर न तो हौसले की कमी है और न जिजीविषा की। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि यहां हुकूमतें बेहद कमजोर हैं और इस कदर लाचार कि हर आतंकी घटना के बाद उनके पास गाल बजाने के अलावा और कुछ करने को नहीं रहता। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके बहादुर गृहमंत्री शिवराज पाटिल की पिछले बम धमाकों के बाद आई प्रतिक्रियाओं को उठाकर देख लीजिए उनमें शब्द तक नहीं बदलते और दिल्ली दरबार ने इसबार भी अपनी इसी परम्परा को जारी रखा है। यूं वैसे भी सरकारें इकबाल से चला करती हैं न कि शब्दों की जुगाली से और इस सरकार के पास शायद जो चीज सबसे कम है वो है उसका इकबाल।
दिल्ली में आतंक के इस तांडव के पीछे सिमी के संगठन इंडियन मुजाहिदीन का नाम सामने है। लेकिन कुछ हफ्तों पीछे नजर दौड़ाइए तो मनमोहन सरकार के एक ताकतवर मंत्री और सरकार के लोकसभा में अपने समर्थन से प्राणदान देने वाले एक दल के सर्वेसर्वा चिल्ला-चिल्लाकर इसी सिमी को देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांट रहे थे। क्या दशकों से आतंक से जूझ रहे किसी भी मुल्क के लिए इससे ज्यादा कोई और शर्मनाक और लिजलिजी बात हो सकती है? आतंक के खिलाफ जूझते हुए कुर्बानी देने वालों के प्रति इससे बड़ा और मजाक क्या हो सकता है? दिल्ली की यह घटना भी ऐसे सियासतदानों का जहन नहीं बदल पाएगी क्योंकि उनके लिए देश वोटों के कारोबार के बाद आता है। ऐसे में क्या फर्क पड़ता है कि मरने वालों की संख्या कितनी है और जख्मी हुए लोगों का आर्तनाद कितना हृदयविदारक है। सच पूछिये तो अपने देश की सरकारें अभी तक आतंकवाद से लड़ना ही नहीं सीख पाई हैं। कदम-कदम पर सियासत इस लड़ाई के हाथ-पांव बांधती नजर आती है और हद तो यह कि राजनीति के अंत:पुर में आतंक से लड़ने वाले कानूनों को भी मजहबी चश्मों से देखे जाने की रवायत अभी तक जारी है। ऐसे में सेना हो, अर्धसैनिक बल हों, या फिर पुलिस। वे दहशतगर्दों से निर्णायक लड़ाई कैसे और किस- तरह लड़ सकते हैं।
...इस बात पर ज्यादा स्यापा करने की जरूरत नहीं कि कौन सा पड़ोसी मुल्क हमारे यहां आतंकवाद फैलाने के लिए जिम्मेवार है। सवाल तो यह है कि क्या हम उस पड़ोसी से दो-टूक ढंग से बात भी करने को तैयार हैं? क्या हम कोई ऐसी लक्ष्मणरेखा भी खींचने को तैयार हैं कि उसका फिर उल्लंघन कोई न करे, हम उसके खिलाफ एक निर्णायक कदम उठाएं? शायद नहीं। संसद भवन पर जब आतंकी हमला हुआ था तब हमने सत्ता के सर्वोच्च शिखर से यह सुना था कि अब इसबार आर-पार का फैसला होगा। तत्कालीन सत्ता के यह शब्द भी हमेशा की तरह निष्प्राण साबित हुए थे।
... आतंकवाद की चुनौतियां जटिल से जटिलतर हो रही हैं, आतंकवादी हाईटेक हो रहे हैं और दुनिया के कुछ मुल्क उनके लिए अपने खजाने का मुंह खोलकर बैठे हुए हैं। लेकिन हम इस बड़ी चुनौती से लचर और अल्प प्रशिक्षित पुलिसबल और बार-बार असफल हो जाने वाली खुफिया व्यवस्था के जरिये दो-दो हाथ करने का जतन कर रहे हैं। राज्यों में पुलिस का तंत्र सत्ताधारियों की सेवाटहल करते-करते अपनी धार खो चुका है और स्थानीय स्तर पर खुफिया जाल समन्वय और प्रशिक्षण के आभाव में निस्तेज हो चला है। संघीय जांच एजंसी की मांग तमाम राज्यों को मंजूर नहीं हो रही है और आतंक के खिलाफ कड़े कानूनों की कुछ राज्यों की मांग केंद्र को नहीं सुहा रही है। ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई हो भी तो कैसे?

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